वृहद् आरण्यक उपनिषद् के एक
संदर्भ में कहा गया है कि स्वप्नावस्था में जीवात्मा इस लोक और परलोक दोनों को देखता है। यही नहीं इस अवस्था में वह वहां के दुख और आनंद दोनों का उपभोग करता है।

dream wise indecation

वेदाचार्य मनीष त्रिवेदी, उज्जैन
ब्रह्मसूत्र की बात करें तो वेदांत दर्शन के तीसरे अध्याय के दूसरे पाद में स्वप्न विचार का विस्तृत उल्लेख है। स्वप्न स्थूल शरीर को स्वयं अचेत करके नए शरीर की रचना करते हुए जगत को देखता है। उस अवस्था में सचमुच न होते हुए भी रथ, रथ को ले जाने वाले वाहन और उसके मार्ग तथा आनंद, मोद, प्रमोद की एवं कुंड की सरोवर और नदियों की रचना कर लेता है।

जागृत अवस्था का शयन काल में निरूपण

स्व प्न में भी जागृत की भांति सांसारिक पदार्थों की रचना होती है। भारतीय मनीषियों की वेद प्रकृति के सिद्धांत पर प्रकाश डालें तो अन्यान्य श्रुतियों का समायोजन धर्म ग्रन्थों में दिखाई देता है। मानव जीवन मानसिक संरचनाओं का जागृत स्वरूप है। यदि हम प्राकृ-शैली की बात करें तो हमारे धर्म ग्रंथों में अलग-अलग प्रकार के नियमन की विवेचना की गई है। पौराणिक मान्यता से भी देखें तो सृष्टि की आरंभिक संरचना में जीव तत्त्व के उदय तथा अस्त के सन्दर्भ में बताया गया है। स्वप्न एक ऐसा शब्द है जो जागृत अवस्था का शयन काल में निरूपण करता है। यदि हम बात करें कि आज हम किसी हिल स्टेशन पर घूमने गए हैं। और हम पूरा क्षेत्र भ्रमण कर चुके हंै। यह बात हम किसी से करते हैं तो सामने वाले व्यक्ति के द्वारा यह उत्तर आता है कि आपने उस जगह का तो दर्शन ही नहीं किया जिसके बारे में रहस्य है? सामने वाले ने इस बात को कहकर छोड़ दिया किन्तु हमारे अवचेतन में उस वाक्य ने स्थान बनाया। यही बिन्दु हमारे शयनकाल में स्वप्न के रूप में रहस्य को खोजने की कोशिश करेगा।

सा धक को चाहिए कि स्वप्न के रहस्य को समझ कर परम दयालु, परम शक्ति, परब्रह्म परमेश्वर के आश्रित होकर निरंतर उनका ध्यान करें और इस बंधन से छुटकारा पाने के लिए भगवान से प्रार्थना करें।

सत्य सिद्धा भी है स्वप्न
क ठोपनिषद् में यह वर्णन आया है, ‘य ऐषु सुप्तेषु जागर्ति कामम् कामम् पुरुषो निर्मिमाण:।Ó यह नाना प्रकार के भोगों की रचना करने वाला पुरुष अन्य सबके सो जाने पर स्वयं जागता रहता है इसमें पुरुष को कामनाओं का निर्माता कहा गया है। कठोपनिषद् (1/1/23-24) के अनुसार पुत्र पौत्र आदि काम अथवा कामना के विषय है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि स्वप्न सृष्टि है। (इस प्रकार पूर्व पक्षी के द्वार स्वप्न की सृष्टि को सत्य सिद्ध करने की गई तथा उसे जीव कर्तृक बताया गया है। अब सिद्धांत की और से उसका उत्तर दिया जाता है। ) स्वप्न की सृष्टि का वर्णन करते हुए श्रुति ने यह बात पहले ही स्पष्ट कर दी है कि जीवात्मा जहां जिन-जिन वस्तुओं की रचना करता है। वे वास्तव में नहीं है। इसके सिवा यह देखा भी जाता है कि स्वप्न में सब वस्तुएं पूर्ण रूप से देखने में नहीं आती है जो कुछ देखा जाता है वह अनियमित और अधूरा ही देखा जाता है।

 

स्वप्न सृष्टि है माया रूप Astrology In Hindi

प्रश्नोपनिषद् में तो स्पष्ट ही कहा है कि जागृत अवस्था में सुनी- देखी हुई और अनुभव की गई वस्तुओं को स्वप्न में देखता है। किन्तु विचित्र ढंग से देखता है। देखी-सुनी और न देखी-सुनी को भी देखता है तथा अनुभव की गई और अनुभव नहीं की गई चीजों को भी देखता है। इन सब कारणों से यह सिद्ध होता है कि स्वप्न की सृष्टि वास्तविक नहीं जीव को कर्म फल का भोग कराने के लिए भगवान अपनी योग माया से उसके कर्म संस्कारों की वासना के अनुसार वैसे दृश्य देखने में उसे लगा देता है। अत: वह स्वप्न सृष्टि को माया मानता है। जागृत की भांति सच्ची नहीं। यही कारण है कि उस अवस्था में किए हुए शुभ-अशुभ कर्मों का फल जीवात्मा को नहीं भोगना पड़ता है। पहले पक्ष में यह बात कही थी कि किसी-किसी शाखा वाले लोग पुरुष को पुत्र-पौत्रादि काम में विषयों में रचना करने वाला बताते हैं वह ठीक नहीं है। वहां स्वप्नावस्था वाला प्रकरण नहीं है। उस मंत्र में जीवात्मा को काम्य विषयों का निर्माता नहीं कहा बल्कि परमात्मा माना है।

स्वप्न व्यर्थ या सृष्टि
कई धार्मिक और शास्त्रीय ग्रंथों के अनुसार भगवान अपनी योग माया से व्यक्ति को उसके कर्म संस्कारों के अनुसार स्वप्न दिखाते हैं।

प्रथम पक्ष :  इससे यह सिद्ध होता है कि स्वप्न सर्वथा व्यर्थ है। उसकी कोई सार्थकता नहीं है। स्वप्न भविष्य में होने वाले शुभाशुभ परिणाम का सूचक भी होता है क्योंकि श्रुति से यह सिद्ध होता है और स्वप्न विषयक शास्त्र को जानने वाले भी ऐसी बात कहते हैं। श्रुति के प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि स्वप्न सर्वथा व्यर्थ नहीं हैं। वह वर्तमान के आगामी परिणाम का भी सूचक होता है। इसके सिवा जो स्वप्न विज्ञान को जानने वाले विद्वान हैं वे भी इसी प्रकार स्वप्न में देखें हुए दृश्यों को भविष्य में होने वाली शुभाशुभ घटनाओं के सूचक बताते हैं।
दूसरा पक्ष :  जीवात्मा ईश्वर का अंश है। इसलिए यह भी ईश्वर के सदृश्य गुण वाला है इसमें कोई संदेह नहीं। परन्तु इसके वे सबगुण तिरोहित हैं, छिपे हुए हैं इस कारण इसका उपयोग नहीं देखा जाता है। उस परब्रह्म परमेश्वर का निरंतर ध्यान करने से जीव के वे सभी छिपे हुए गुण पुन: प्रकट हो सकते हैं। (श्वे. उप. 1/10) परमेश्वर की आराधना के बिना अपने आप उनका प्रकट होना संभव नहीं है क्योंकि इस जीव का अनादि सिद्ध बंधन और उससे मुक्त होना उस जगतकर्ता परमेश्वर के ही अधीन है। इसलिए वह स्वयं स्वप्न की सृष्टि आदि कुछ नहीं कर सकता है।

Latest News