old currency of india
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नई दिल्ली – प्राचीन काल से ही मुद्राएं अपने दौर की संपन्नता दर्शाती आईं हैं। मुद्राओं में अंकित छाप उस दौर की संस्कृति और व्यापार के साथ लेन-देन को दर्शाती रही हैं। मुद्राओं के बदलने के साथ समाज और देश की संस्कृति और व्यवस्था का दर्शन करीती रही हैं मुद्राएं। इसी तरह का एक मुद्रा उत्सव चल रहा है दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में, यहां आपको हजारों की संख्या में प्राचीन सिक्के और नोट देखने को मिलेंगे। मुद्रा उत्सव की खासियत यह है कि यहां आपको दो से ढाई हज़ार साल पुराने दुर्लभ सिक्के और साथ में चोल वंश व विजय नगर का शासन काल की मुद्राएं भी देखने को मिलेंगी।

सोमवार तक चलने वाली इस प्रदर्शनी में मुगल काल के सिक्कों से लेकर ब्रिटिश पीरियड के सिक्कें भी रखे गए हैं, जिन्हें देखने बड़ी तादद में लोग आ रहे हैं। देश के गौरवशाली राज वंशों के दौर में चलने वाले सिक्के, तो मुगल बादशाहों के दौर के सिक्के इस प्रदर्शनी की शोभा बढ़ा रहे हैं। यदि 1947 के बाद के सिक्कों और नोटों को देखें तो यहां इनकी भरमार है, और हर सिक्का और नोट अपनी कहानी बयां कर रहा है।

यहां एक सिक्का ऐसा भी है जिसे उठाने के लिए आपको काफी मशक्कत करनी पड़ सकती है, जी हां हम बात कर रहे हैं 300 डालर के आस्ट्रेलियाई सिक्के की, इस सिक्के को जो भी देख रहा है वह हैरान ज़रूर होता है। इस सिक्के का वजन 10 किलोग्राम है, यदि भारत की मुद्रा से इसकी तुलना करें तो इसकी कीमत वर्तमान में करीब 11 लाख रुपये है।

प्रदर्शनी के कई स्टॉल लगाए गए हैं, एक सिक्का देश की स्वाधीनता संग्राम से संबंधित है इसमें साल 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को दर्शाता है तो कई सिक्के साल 1859-60 का नील विद्रोह व कूका आंदोलन को दर्शाने वाली मुद्राएं भी हैं। यहां कई सिक्के पत्थर, टेराकोटा व धातुओं से बने हैं, जो दो से ढाई हजार साल पुराने बताए जा रहे हैं। प्रदर्शनी का आयोजन दिल्ली काइंस सोसाइटी द्वारा गया है सोसाइटी के प्रदर्शनी का उद्देश्य है देश की विरासत के समृद्ध पहलू को देश वासियों से रूबरू कराना और युवाओं को जागरूक करना।

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