बिहार के उन पत्रकारों के लिए जो नैंसी और बिहार बोर्ड पर आज दुखी हैं…
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साल 2005 का जनवरी या फरवरी का महीना होगा। बिहार में चुनाव हो रहे थे। किसी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। राष्ट्रपति शासन लगा था बिहार में। बूटा सिंह राज्यपाल थे। मैं पहली बार जाना था राष्ट्रपति शासन का मतलब।
फिर नंवबर में उसी साल चुनाव हुए। बीजेपी और नीतीश की पार्टी चुनाव जीत गई थी। बिहार के माननीय मुख्यमंत्री बने नीतीश बाबू।
सबसे पहले उन्होंने जो दो काम किया वो था बिहार में दारू की दुकानों को घर-घर तक पहुंचाना और बिहार की शिक्षा व्यवस्था का कमर तोड़ देना। उन्होंने इन दो कामों को सबसे पहले किया। बाकी और कुछ भी किये होंगे लेकिन एक 8वीं-9वीं में पढ़ने वाले छात्र के रूप में मैंने इन्हें ही देखा क्योंकि ये मुझे दिख रहा था।
मेरे गांव के बगल में ठेके खुल गए जो कभी थे नहीं। ये तब तक रहे जब तक खुद माननीय ने शराबबंदी लागू नहीं की। उन्होंने शराबबंदी लागू कर के कोई बहुत बड़ा तीर नहीं मारा, जो कि उनका चुनाव निसान है बल्कि अपनी ही गलतियों पर लीपापोती किया। आप इसे बड़ा कदम मान कर उनके लिए भाट-चारण बने रहिए।
आपको तब ये इसलिए नहीं दिखा क्योंकि तब वो बड़े-बड़े गुंडो को जेल भेज रहे थे। जैसे शहाबुद्दीन और पता नहीं किनको-किनको। लेकिन आप भूल गए कि वो एक को जेल भेज रहे हैं लेकिन बिहार जैसे राज्य में शराब की दुकानों को घर-घर तक पहुंचा कर वो कितने शहाबुद्दीन पैदा भी कर रहे हैं जो आज नैंसी जैसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। बिहार में ऐसी घटनाएं नहीं होती थी। आप भी जानते हैं और मैं भी। लेकिन आप कारण खोजिये, मैं आपको बता रहा हूं।
बिहार की शिक्षा व्यवस्था को तोड़ा नहीं नीतीश ने बल्कि खत्म कर दिया। मैं शुरू से ये मानते आया हूं। जब मौका मिला तब कहा भी हूं। साल 2007 के पहले बिहार की शिक्षा व्यवस्था कैसी थी, उसका सिलेबस कैसा था। आप सब जानते होंगे, लेकिन माननीय ने ये तर्क दिया कि हमारे राज्य के बच्चे बाक़ी राज्यों से पिछड़ रहे हैं इसलिए हम सिलेबस से लेकर मार्किंग सिस्टम तक में बदलाव करेंगे। किया भी। लेकिन बर्बाद करने के लिए किया। ऐसा किया कि आज बच्चों का क्या हाल है वो आपके सामने है। आप विश्लेषण करते रहिए।
अंततः- किसी से आगे निकलने के लिए आप दो तरीके अपनाते हैं। पहला यह कि आप सामने वाले को कमजोर कर दो। दूसरा यह कि आप सामने वाले से मजबूत हो जाओ। लेकिन नीतीश ने दोनों नहीं किया। न मजबूत हुए और न ही किसी को कमजोर कर पाए। बिहार को गर्त में ले गए सिर्फ। शराब को घर तक पहुंचा कर और बिहार की शिक्षा व्यवस्था को खत्म कर।
आज आपको चिंता इसलिए हो रही है क्योंकि नीतीश द्वारा किये गए इन दोनों कामों का अब रिजल्ट आने लगा है। जैसे उन्होंने शराबबंदी कर के अपनी सबसे बड़ी दुसरी गलती को सुधारा है उसी तरह शिक्षा व्यवस्था पर ध्यान दे कर उन्हें अपनी पहली सबसे बड़ी गलती को सुधारना पड़ेगा। अगर ये नहीं हुआ, तो वो बिहार की आने वाली पीढ़ियों के बर्बादी के जिम्मेदार होंगे।

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