तारीखों की घोषणा, Rajasthan Panchayat Election पर राजस्थान हाईकोर्ट ने किया रास्ता साफ़

Rajasthan Panchayat Election Update: राजस्थान की स्थानीय राजनीति और लोकतंत्र के लिहाज से एक बेहद बड़ा फैसला सामने आया है। प्रदेश में लंबे समय से अटके पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों (Local Body Elections) के आयोजन को लेकर राजस्थान हाई कोर्ट ने एक बड़ा और निर्णायक आदेश जारी किया है। कोर्ट ने राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग को सख्त हिदायत देते हुए 31 जुलाई 2026 तक हर हाल में चुनाव प्रक्रिया संपन्न कराने की नई समय सीमा (Deadline) तय कर दी है। यह अहम निर्णय कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायमूर्ति संजित पुरोहित की खंडपीठ ने सुनाया है।

High Court Directives and New Deadline for Local Polls

राजस्थान हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और चुनाव आयोग द्वारा दायर विशेष प्रार्थना पत्र पर गहन सुनवाई करने के बाद यह नई तारीख मुकर्रर की है। इससे पहले, अदालत ने सरकार को 15 अप्रैल 2026 तक ही चुनाव कराने की मोहलत दी थी, जिस आदेश को बाद में देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने भी सही ठहराया था। लेकिन सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग की रिपोर्ट तैयार होने में लग रहे समय और प्रशासनिक व्यस्तताओं का हवाला देकर अतिरिक्त समय की मांग की थी। सभी पक्षों की लंबी जिरह सुनने के बाद खंडपीठ ने गत 11 मई को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे आज सुनाते हुए साफ किया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्थानीय निकायों को बिना जनप्रतिनिधियों के लंबे समय तक नहीं छोड़ा जा सकता।

Prominent Petitioners Who Challenged the Election Delay

प्रदेश में समय पर स्थानीय चुनाव न कराए जाने के खिलाफ कई बड़ी राजनीतिक और सामाजिक शख्सियतों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। इस कानूनी लड़ाई में मुख्य याचिकाकर्ता के तौर पर गिरिराज सिंह देवंदा ने सरकार की देरी को चुनौती दी थी। इसके साथ ही, वरिष्ठ कांग्रेस नेता संयम लोढ़ा ने भी अदालत में याचिका दायर कर जनप्रतिनिधियों का कार्यकाल खत्म होने के बाद तुरंत चुनाव कराने की मांग उठाई थी। हाई कोर्ट के इस नए फैसले के बाद अब शासन और प्रशासन दोनों पर तय समय के भीतर वोटिंग कराने का भारी दबाव बन गया है।

Arguments by Advocate General on One State One Election Concept

अदालत के भीतर राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए महाधिवक्ता (Advocate General) राजेंद्र प्रसाद ने कई व्यावहारिक और नीतिगत दलीलें पेश कीं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि प्रदेश की कई पंचायत समितियों और जिला परिषदों का प्रशासनिक कार्यकाल आगामी अक्टूबर से दिसंबर के बीच समाप्त हो रहा है। ऐसे में अगर सभी निकायों के चुनाव एक साथ कराए जाएं, तो इससे देश में चल रही ‘वन स्टेट-वन इलेक्शन’ (One State-One Election) की मुहिम को मजबूती मिलेगी। महाधिवक्ता ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार ने 15 अप्रैल के आदेश का पालन करने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों के चलते ऐसा कर पाना मुमकिन नहीं हो सका।

Administrative Constraints Cited by Government for Extension

चुनावों को आगे खिसकाने के लिए सरकार की ओर से अदालत के सामने संसाधनों और जनशक्ति से जुड़ी कई व्यावहारिक दिक्कतें गिनाई गईं, जिनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:

बोर्ड परीक्षाओं और कॉपियों के मूल्यांकन में स्कूली शिक्षकों की लगी ड्यूटियां।

प्रदेश में भीषण गर्मी का मौसम और ग्रामीण इलाकों में कृषि (खेती-बाड़ी) के सीजन की व्यस्तता।

निकायों में आरक्षण की स्थिति साफ करने वाली ओबीसी आयोग की अंतिम रिपोर्ट का लंबित होना।

इन सभी कारणों के आधार पर सरकार ने चुनावी कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की अनुमति मांगी थी।

Counter Arguments by Opposing Counsel and Final Ruling

दूसरी तरफ, याचिकाकर्ताओं के वकील अधिवक्ता प्रेमचंद देवदा ने सरकार की इन दलीलों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध ‘सुरेश महाजन बनाम मध्य प्रदेश सरकार’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि यदि ओबीसी आयोग की रिपोर्ट में देरी हो रही है, तो भी आरक्षण के बिना तुरंत चुनाव कराए जा सकते हैं, क्योंकि पंचायतों का कार्यकाल पहले ही पूरा हो चुका है। उन्होंने कोर्ट का ध्यान इस ओर भी दिलाया कि सरकार ने 15 अप्रैल तक निकायों की अंतिम मतदाता सूची (Voter List) तक जारी नहीं की थी और न ही हाई कोर्ट के पुराने आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, इसलिए वह आदेश अंतिम था।

दोनों पक्षों की इस तीखी बहस के बाद, अदालत ने संतुलन बनाते हुए सरकार को तैयारियां दुरुस्त करने के लिए 31 जुलाई तक का आखिरी मौका दे दिया है, जिससे अब प्रदेश में चुनावी हलचल पूरी तरह तेज हो गई है।

 

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