सनातन धर्म के महान ग्रंथ रामायण में लंकापति रावण को एक परम ज्ञानी, महाप्रतापी राजा और प्रकांड पंडित के रूप में दर्शाया गया है। उसकी शक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने अपने बाहुबल से यमराज, कुबेर और देवराज इंद्र सहित तमाम देवी-देवताओं को परास्त कर अपने वश में कर लिया था। लेकिन जब इसी परम शक्तिशाली रावण ने माता सीता का छल से हरण किया, तो उसने उन्हें लंका के वैभवशाली महलों में वैभव और ऐश्वर्य के बीच रखने के बजाय खुले आसमान के नीचे अशोक वाटिका में रखा।
माता सीता महीनों तक रावण की कैद में रहीं, लेकिन रावण ने कभी भी उनके साथ बलपूर्वक दुराचार या उन्हें अपवित्र करने का दुस्साहस नहीं किया। आम तौर पर लोग इसे रावण की मर्यादा या उसका नैतिक धर्म मान लेते हैं, परंतु वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में दर्ज कथा के अनुसार इसके पीछे रावण की कोई अच्छाई नहीं, बल्कि उसे मिले दो भयंकर और कालजयी श्राप थे। रावण भली-भांति जानता था कि माता सीता को उनकी मर्जी के बिना स्पर्श करते ही उसका सर्वनाश निश्चित है।
The Horrific Curse of Kubera Son Nalakubera
वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में वर्णित कथा के अनुसार, रावण जब अपने त्रिलोक विजय अभियान पर निकला हुआ था, तब सभी लोकों को जीतते हुए वह स्वर्ग लोक की तरफ बढ़ रहा था। इसी यात्रा के दौरान उसकी नजर धन के देवता कुबेर के पुत्र नलकुबेर की अर्धांगिनी और स्वर्ग की परम सुंदरी अप्सरा रंभा पर पड़ी। रंभा रिश्ते में रावण की पुत्रवधू (बहू) के समान थी। लेकिन वासना में अंधे रावण ने रंभा की चीख-पुकार और मर्यादा को ताक पर रखकर उसकी इच्छा के विरुद्ध बलपूर्वक उसके साथ दुराचार किया।
जब इस घोर पाप और रंभा के अपमान की बात नलकुबेर को पता चली, तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने हाथों में जल लेकर रावण को अत्यंत भयानक श्राप दे दिया:
“नचेत्कामामुपैति त्वाम् प्रधर्षयति योषितम्। मूर्धा तु सप्तधा तस्य शकलीभविष्यति।।”
नलकुबेर ने श्राप दिया कि आज के बाद यदि रावण ने संसार की किसी भी स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उसे स्पर्श किया या उसके साथ बलपूर्वक दुराचार करने का प्रयास किया, तो उसी क्षण रावण का मस्तक सात टुकड़ों में बंट जाएगा और उसकी तत्काल मृत्यु हो जाएगी।
Lord Brahma Verdict Restrained Ravana Cruelty
नलकुबेर के अलावा स्वयं सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी का एक श्राप भी माता सीता के लिए अभेद्य ढाल बना हुआ था। रावण ने पूर्व में ब्रह्मा जी की सभा में रहने वाली ‘पुंजिकस्थला’ नामक एक अन्य अप्सरा के साथ भी उसकी मर्जी के बिना दुर्व्यवहार किया था। इस घटना से क्रोधित होकर परमपिता ब्रह्मा जी ने रावण को मर्यादा में रखने के लिए श्राप दिया था कि यदि उसने किसी भी पर-स्त्री पर उसकी इच्छा के विरुद्ध वासना दृष्टि डाली या बल प्रयोग किया, तो उसका सिर शत-खंड (सौ टुकड़ों) में फटकर भस्म हो जाएगा।
स्वयं रावण ने इस बात को स्वीकार करते हुए रामायण में कहा है:
“पितामहेन मे पूर्वं समया प्रदिष्टा पुरा। प्रधर्षयति यामद्यां नारीं मदनमोहितः।। मूर्धा तु शतधा तस्य शकलीभविष्यति। तस्माद्भीतेन मे सीता नाधिरूढा वराङ्गना।।”
अर्थात, ब्रह्मा जी के इसी दंड और खोपड़ी के चिथड़े उड़ जाने के डर से रावण माता सीता के समीप जाने का साहस नहीं कर पाता था।
The Psychological Fear That Protected Goddess Sita
यही मुख्य कारण था कि माता सीता का हरण करने के बाद भी रावण पूरी तरह से बेबस और इन भयंकर श्रापों के बंधनों में जकड़ा हुआ था। वह अच्छी तरह जानता था कि अशोक वाटिका में बैठी माता सीता साक्षात सतीत्व का प्रतीक हैं और यदि उसने उनके आत्मसम्मान को बलपूर्वक ठेस पहुंचाई, तो नलकुबेर और ब्रह्मा जी का श्राप तत्काल सक्रिय हो जाएगा और राम से युद्ध लड़ने से पहले ही उसका अंत हो जाएगा। इसी खौफ के कारण रावण हमेशा माता सीता से एक निश्चित दूरी पर खड़े होकर केवल अपनी राक्षसियों के दम पर उन्हें डराता-धमकाता था, परंतु उन्हें हाथ लगाने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाता था।